AI summit in Delhi : क्या वे हथियारों की तरह ही हमें बेचा करेंगे AI के नए-नए फितूर?


AI summit in Delhi

By Jayjeet Aklecha (जयजीत अकलेचा)

 शेयर मार्केट, जॉब्स मार्केट और लोकल बाज़ारों में पसरी लेकर ढेर सारी अनिश्चितताओं के बीच आज नई दिल्ली में एआई पर महासमिट होने जा रही है। भारत भले ही एआई के विकास और इनोवेशन में पीछे हो, लेकिन आंकड़े बता रहे हैं कि हमारी कंपनियां और आम कर्मचारी इसका इस्तेमाल करने के मामले में ग्लोबल एवरेज़ से कहीं आगे हैं।

 तो क्या भारत भविष्य में भी उसी तर्ज पर एआई का सबसे बड़ा ग्राहक बन सकता है, जैसे हथियारों के कारोबार में सबसे बड़ा ख़रीदार है? स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत हथियारों की ख़रीद में यूक्रेन के बाद दुनिया में सबसे आगे है (यूक्रेन केवल युद्ध की वजह से टॉप पर है, अन्यथा इस पोजिशन पर भारत ही रहता)।

आपको लग सकता है कि आख़िर एआई और हथियारों के कारोबार को आपस में गड्डमड्ड क्यों किया जा रहा है? मैं यहां जो बताने जा रहा हूं, आप इसे ‘कॉन्सिपरेसी थ्योरी' कहकर ख़ारिज भी कर सकते हैं, लेकिन फिर भी इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। हो सकता है, यही भविष्य का कड़वा सच साबित हो।

एआई से इस वक़्त कोई विशेष रेवन्यू जनरेट नहीं हो रहा। यहां तक कि कई विशेषज्ञ इसे एआई बबल तक बता रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद हालिया रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के चार बड़े दिग्गज - अल्फ़ाबेट, माइक्रोसॉफ़्ट, मेटा और अमेज़न इस साल अपने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने के लिए कुल मिलाकर क़रीब 700 अरब डॉलर ख़र्च करने की तैयारी में हैं (सीएनबीसी की रिपोर्ट)। यह राशि कितनी ज्यादा है, इसका अंदाज़ा केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि साल 2026-27 के लिए भारत का कुल बजटीय आवंटन ही क़रीब 644 अरब अमेरिकी डॉलर रहा है। यानी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक ताक़त का दम भरने वाले भारत के कुल बजट से भी ज़्यादा ख़र्च ये चारों अमेरिकी कंपनियां कर रही हैं। ध्यान रहें, यह केवल चार कंपनियों का ख़र्च है। एआई के बुनियादी ढांचे पर इस समय क़रीब 600 कंपनियां (जिन्हें AI की भाषा में हाइपरस्केलर कहते हैं) काम कर रही हैं।

 ये टेक कंपनियां इतना ख़र्च क्यों रही है? सिप्री की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में पूरी दुनिया को 679 अरब डॉलर के हथियार बेचे गए। यह राशि दुनिया के नीचे के क़रीब 85 फ़ीसदी देशों की कुल जीडीपी से भी अधिक है (भारत के कुल बजट से तो अधिक है ही)।

 बड़ा सवाल। तो क्या दुनियाभर में एआई की ज़रूरत का माहौल बना रही टेक दिग्गजों के लिए ये हथियार कंपनियां ही प्रेरणा की स्रोत हैं? ध्यान रहें, इन हथियार कंपनियों की बैलेंस शीट्स में जो आज हरापन नज़र आ रहा है, वह अचानक से नहीं आया है। शीत युद्ध के दौरान इन कंपनियों ने वैसा ही आक्रामक निवेश किया था, जो आज टेक क्षेत्र की कंपनियां एआई में कर रही हैं। उस दौर में लॉकहीड, बोइंग और रेथियॉन ने ऐसी तकनीकों की R&D पर दांव लगाया था, जो पहले कभी मौजूद नहीं थीं। मिसाल के तौर पर, लॉकहीड ने ‘स्टील्थ तकनीक' पर उस वक़्त 1.7 ट्रिलियन डॉलर ख़र्च किए थे। आज लॉकहीड कॉर्पोरेशन इस तकनीक का बेताज बादशाह है। इस तकनीक पर आधारित इसके एफ़-117 नाइटहॉक, एसआर-71 ब्लैकबर्ड, एफ़-22 रैप्टर जैसे विमान सबसे विध्वसंक विमान माने जाते हैं, जिनकी भारी मांग है और जिन्हें बेचकर कंपनी भारी मुनाफ़ा भी कमाती है।

इसी तरह आरटीएक्स (जो पहले रेथियॉन टेक्नोलॉजिस कहलाती थी) ने मिसाइल गाइडेन्स सिस्टम और रडार तकनीक में भारी निवेश किया। आज यह कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी मिसाइल प्रोड्यूसर है। इसकी टॉमहॉक मिसाइलों और पैट्रियट मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम की मांग यूक्रेन से लेकर मध्य-पूर्व तक बनी हुई है। ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि कई संघर्षों और युद्धों में दोनों ही पक्ष इन कंपनियों के साज़-ओ-सामान से लैस होते हैं। यानी कंपनियों के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं। लेकिन यह फ़ायदा वही कंपनियां उठा रही हैं, जिन्होंने दशकों तक शोध एवं विकास पर भारी निवेश किया है।

हथियार कंपनियों के अनुभव एआई पर रिसर्च करने वाली टेक कंपनियों के सामने हैं। यह मानने वाले विशेषज्ञों की कमी नहीं है कि अगर सबकुछ ठीक रहा और एआई का बुलबुला फूटने से बच गया तो अगले दशक में देशों के लिए हथियारों की संख्या तथा उनकी मारक क्षमता नहीं, एआई में दक्षता ही स्वयं को ‘सुरक्षित व विकसित’ बनाए रखने के एक नए भ्रम के रूप में सामने आएगी। तब दुनिया की दिशा ‘वेपन्स प्रॉलिफ़िरेशन’ (शस्त्र-प्रसार) से ‘एआई प्रॉलिफ़िरेशन’ (एआई-प्रसार) की तरफ़ मुड़ जाएगी। ज़ाहिर है, ‘एआई प्रॉलिफ़िरेशन’ का फ़ायदा भी उन्हीं कंपनियों को मिलेगा, जो आज से इसकी तैयारी करेंगी। 700 अरब डॉलर का ख़र्च इसी तैयारी का एक हिस्सा है।

दरअसल, आज हर कंपनी को लग रहा है कि अगर उसने इस समय एआई को नहीं अपनाया तो वे पीछे रह सकती है। दुर्भाग्य से, ऐसा ही तमाम देशों को लग रहा है कि अगर उन्होंने सही वक़्त पर एआई पर फ़ोकस नहीं किया तो वे विकास की दौड़ में वे पिछड़ सकते हैं।

लेकिन देशों में भी यहां दो खेमे हैं। एक वह है तो एआई पर निवेश इसलिए कर रहा है, ताकि भविष्य में अपनी एआई प्रोद्योगिकियों को बेचकर ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमा सके, जैसे अमेरिका और चीन। दूसरा पक्ष वह है जो एआई पर ख़र्च इसलिए कर रहा है, ताकि इसका इस्तेमाल करके मुख्यधारा में बना रह सके, जैसे भारत और अन्य विकासशील देश। हम या हमारे जैसे देश एआई के शोध एवं विकास पर इतना ख़र्च कर ही नहीं सकते कि एआई प्रौद्योगिकी के विक्रेताओं की श्रेणी में आ सके।

अंतत: इसका वही नतीजा निकल सकता है, जो हथियार कारोबार के क्षेत्र में निकला है। वे एआई की नई-नई प्रौद्योगिकियां विकसित करते जाएंगे और हम शान से उन्हें ख़रीदते चले जाएंगे। जैसे हमें राफ़ेल खरीदने में गर्व महसूस होता है, वैसे ही एआई की प्रौद्योगिकी ख़रीदने में होगा। जैसे आज राफ़ेल की ख़रीदी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, वैसे ही तब एआई प्रौद्योगिकी की ख़रीदी पर कोई सवाल उठाने की स्थिति में नहीं होगा।

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